कोरियाई टीम ने बुरादे से बनाया प्लास्टिक कच्चा माल, उत्पादकता तीन गुना
कोरियाई शोधकर्ताओं ने तीन चरणों की ऐसी प्रक्रिया विकसित की है, जो लकड़ी के बुरादे के सेल्युलोज़ को बायो-आधारित प्लास्टिक कच्चे माल FDCA में बदलती है।

दक्षिण कोरिया के शोधकर्ताओं ने लकड़ी के बुरादे में मौजूद सेल्युलोज़ को प्लास्टिक के कच्चे माल में बदलने की नई प्रक्रिया विकसित की है। कोरिया रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी के अनुसार, यह प्रक्रिया पारंपरिक तरीकों की तुलना में उत्पादकता को तीन गुना से ज़्यादा बढ़ाती है।
यह काम संस्थान के रासायनिक प्रक्रिया अनुसंधान विभाग के प्रमुख शोधकर्ता ह्वांग डोंग-वोन की टीम और POSTECH के प्रोफ़ेसर हान जी-हून की टीम ने मिलकर किया है। इसे 'BMF-AMF-FDCA' नाम की तीन चरणों वाली जुड़ी हुई प्रक्रिया कहा गया है।
तीन चरण कैसे काम करते हैं
BMF बुरादे के सेल्युलोज़ को रासायनिक रूप से संसाधित करके बनने वाला मध्यवर्ती पदार्थ है। AMF, BMF से बनने वाला अपेक्षाकृत स्थिर FDCA-पूर्ववर्ती है। FDCA बायो-आधारित रासायनिक कच्चा माल है, जिससे प्लास्टिक बनाया जा सकता है।
टीम ने सल्फ्यूरिक एसिड और ब्रोमाइड लवण का उपयोग करके उच्च दबाव के बिना, सामान्य वायुमंडलीय दबाव पर ही सेल्युलोज़ को BMF में बदला। ह्वांग के मुताबिक प्रक्रिया पानी और तेल के न मिलने के सिद्धांत पर आधारित है: अस्थिर मध्यवर्ती बनते ही तेल की परत में चला जाता है और छनकर अलग हो जाता है। इससे मध्यवर्ती को अलग करने, शुद्ध करने या विलायक बदलने के चरण भी न्यूनतम रह गए।
नतीजे
BMF की उपज अधिकतम 82% तक पहुँची। 10 लीटर के रिएक्टर में भी 73 से 79% उपज दर्ज की गई। हैलोजन-आधारित पदार्थों का उपयोग पारंपरिक हाइड्रोक्लोरिक एसिड आधारित CMF प्रक्रिया की तुलना में 30वें हिस्से तक घट गया। टीम ने 99% से अधिक शुद्धता वाला FDCA तैयार किया। कुल द्रव्यमान उपज सेल्युलोज़ के आधार पर अधिकतम 56.8% और लकड़ी के बुरादे के आधार पर 45.5% रही। तुलना के लिए, 2022 में नीदरलैंड के ग्रोनिंगन विश्वविद्यालय आदि के शोध में सेल्युलोज़ आधारित कुल उपज 32.7% थी।
शोध के नतीजे अंतरराष्ट्रीय पत्रिका केमिकल इंजीनियरिंग जर्नल (IF 12.5) के नवंबर अंक में प्रकाशित हुए हैं।
टीम अब उद्योग मंत्रालय के साथ मिलकर सालाना 1,000 टन से अधिक उत्पादन वाले डेमो प्लांट की परियोजना की तैयारी कर रही है। यह परियोजना पूरी होने के बाद, यानी 2030 के बाद, व्यावहारिक उपयोग की संभावना जताई गई है।
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