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भारत ने लिथियम-निकल प्रोसेसिंग के लिए ₹2,814 करोड़ की योजना को दी मंज़ूरी

केंद्रीय कैबिनेट ने ₹2,814 करोड़ की कैपेक्स सपोर्ट स्कीम को मंज़ूरी दी है। इससे लिथियम और निकल की दो-दो प्रोसेसिंग इकाइयां लगेंगी और आयात पर निर्भरता घटेगी।

Industrial processing plant with stacks of battery-grade lithium and nickel material, representing India's planned critical mineral refining capacity.
छवि: Inc42 Media

केंद्रीय कैबिनेट ने देश में लिथियम और निकल की प्रोसेसिंग सुविधाएं स्थापित करने के लिए एक योजना को मंज़ूरी दी है। "कैपेक्स सपोर्ट स्कीम टू प्रमोट क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग" नाम की इस योजना का वित्तीय परिव्यय ₹2,814 करोड़ है और यह FY27 से FY31 तक, यानी पांच साल चलेगी।

इस परिव्यय से कुल चार संयंत्र लगेंगे, लिथियम और निकल के दो-दो। सरकार के बयान के मुताबिक ये इकाइयां लिथियम और निकल के अयस्क या मध्यवर्ती उत्पादों को उच्च शुद्धता वाले यौगिकों में बदलेंगी। निकल उत्पादन के दौरान उप-उत्पाद के रूप में कोबाल्ट भी निकाले जाने की उम्मीद है।

सब्सिडी और शर्तें

लाभार्थियों को पात्र निवेश का 30% तक मील के पत्थर से जुड़ी पूंजीगत सब्सिडी मिलेगी, हालांकि कुछ सीमाएं लागू होंगी। लिथियम प्रोसेसिंग के लिए प्रति लाभार्थी अधिकतम ₹500 करोड़ का समर्थन मिलेगा और हर संयंत्र की न्यूनतम क्षमता 30 किलो-टन होनी चाहिए। निकल के लिए अधिकतम सहायता ₹900 करोड़ प्रति लाभार्थी है और हर संयंत्र की न्यूनतम क्षमता 50 किलो-टन तय की गई है।

चयन दो चरणों में होगा। पहले तकनीकी योग्यता परखी जाएगी, फिर वित्तीय बोली लगेगी। "लीस्ट-कॉस्ट" मानदंड के तहत सबसे कम पूंजीगत सहायता मांगने वाले योग्य आवेदक चुने जाएंगे। प्रोत्साहन राशि तीन किस्तों में तय मील के पत्थरों के आधार पर दी जाएगी, यानी पूरी सब्सिडी एक साथ नहीं मिलेगी।

आयात निर्भरता क्यों बड़ी चिंता है

सरकार का कहना है कि क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग दुनिया के कुछ ही स्थानों पर केंद्रित है, जिससे सप्लाई चेन भू-राजनीतिक व्यवधान, कीमतों में उतार-चढ़ाव और संभावित पाबंदियों के जोखिम में रहती है। भारत फिलहाल लिथियम, कोबाल्ट और निकल सहित कई क्रिटिकल मिनरल्स के कच्चे और परिष्कृत दोनों रूपों के लिए 100% आयात पर निर्भर है।

योजना का फोकस सिर्फ खनन नहीं, प्रोसेसिंग पर है, ताकि कच्चे माल को यौगिकों में बदलकर ज़्यादा मूल्य देश में रखा जा सके। सरकार के अनुसार इससे इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, BESS, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और स्पेशियलिटी स्टील जैसे क्षेत्रों को सहारा मिलेगा। हालांकि आगे की राह आसान नहीं होगी, क्योंकि लाभार्थियों को कच्चे माल और प्रोसेसिंग क्षमता भी जुटानी होगी।

पिछले एक साल में कैबिनेट की यह ऐसी दूसरी योजना है। दिसंबर 2025 में कैबिनेट ने क्रिटिकल मिनरल्स की कम से कम 270 किलो-टन सालाना रीसाइक्लिंग क्षमता विकसित करने के लिए ₹1,500 करोड़ की प्रोत्साहन योजना को भी मंज़ूरी दी थी।

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