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बायोवेस्ट से केमिकल: पोलिश टीम ने कचरे को बनाया कच्चा माल

प्रो. Piotr Oleśkowicz-Popiel की टीम सूक्ष्मजीवों के समूहों से बायोवेस्ट को कैप्रोइक एसिड में बदल रही है, जो कॉस्मेटिक्स, खाद्य उत्पादों और भविष्य में जेट ईंधन में काम आ सकता है।

Laboratory bioreactor in which a mixed community of microorganisms ferments organic waste into chemical compounds.
छवि: MamStartup

पोलैंड में प्रो. Piotr Oleśkowicz-Popiel के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक टीम खाद्य उद्योग के अवशेषों और घरेलू बायोवेस्ट को उद्योग के लिए उपयोगी रसायनों में बदलने की तकनीक विकसित कर रही है। इसके लिए किसी एक अलग किए गए बैक्टीरिया के बजाय सूक्ष्मजीवों के पूरे समुदायों का इस्तेमाल किया जाता है।

कैसे काम करती है तकनीक

प्रक्रिया फर्मेंटेशन पर आधारित है, यानी वही बुनियादी तंत्र जो बीयर या सauerkraut बनाने में होता है। फर्क यह है कि यहाँ सूक्ष्मजीवों को भोजन के रूप में बायोवेस्ट दिया जाता है और परिस्थितियाँ इस तरह चुनी जाती हैं कि वे एक खास, मूल्यवान रसायन बनाएँ। मिश्रित कल्चर की खूबी उनका लचीलापन है। एक अकेले स्ट्रेन को बहुत विशिष्ट “भोजन” चाहिए, जबकि समुदाय अधिक जटिल मिश्रण को पचा सकता है। इसलिए कचरे का एकसमान या बिल्कुल साफ होना ज़रूरी नहीं। टीम ने अन्य चीज़ों के अलावा खट्टे मट्ठे (acid whey) पर काम किया है; जूस और सब्ज़ी प्रसंस्करण के अवशेष भी संभावित स्रोत हैं।

टीम का मुख्य उत्पाद कैप्रोइक एसिड है। यह मध्यम-श्रृंखला कार्बोक्सिलिक अम्लों में आता है और “प्लेटफ़ॉर्म” यौगिक माना जाता है, जिससे आगे कई उत्पाद बन सकते हैं। इससे खाद्य पदार्थों, इत्र, कॉस्मेटिक्स और सफ़ाई उत्पादों के लिए यौगिक मिल सकते हैं, और आगे चलकर विमान ईंधन भी संभव है।

कार्बन फुटप्रिंट और अगली चुनौती

टीम की शुरुआती गणनाओं के अनुसार बायोवेस्ट से बने उत्पादों का कार्बन फुटप्रिंट जीवाश्म-आधारित पारंपरिक उत्पादों की तुलना में 80 प्रतिशत तक कम हो सकता है। शोधकर्ता साफ़ कहते हैं कि कोई भी प्रक्रिया पूरी तरह उत्सर्जन-मुक्त नहीं होती, क्योंकि फर्मेंटेशन और आगे की प्रोसेसिंग में भी ऊर्जा लगती है।

सबसे बड़ी चुनौती प्रयोगशाला से औद्योगिक संयंत्र तक पहुँचना है। टीम के पास अभी कुछ दर्जन लीटर क्षमता का लैब रिएक्टर है। अगला कदम 1000 लीटर, यानी एक घन मीटर तक का डेमो प्लांट है, जिसकी डिज़ाइनिंग चल रही है। बड़े रिएक्टर में तापमान, मिश्रण और pH हर जगह समान नहीं रहते, और सूक्ष्मजीव इन अंतरों पर प्रतिक्रिया करते हैं।

टीम करीब दस साल से इस विषय पर शोध कर रही है। अब Foundation for Polish Science के PRIME कार्यक्रम के तहत वह बाज़ार, ग्राहकों और निवेशकों के नज़रिए से तकनीक को परख रही है। प्रो. Oleśkowicz-Popiel और डॉ. Filip Brodowski तकनीक को आगे बढ़ाने के लिए एक कंपनी बनाने पर विश्वविद्यालय से बातचीत भी कर रहे हैं।

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